मुंबई: महाराष्ट्र में विधान परिषद (MLC) चुनाव को लेकर नामांकन के आखिरी दिन जोरदार सियासी हलचल देखने को मिली। 12 मई को होने वाले इस चुनाव के लिए गुरुवार को नामांकन की अंतिम तारीख थी, और अंतिम समय तक सियासी गतिविधियां तेज रहीं। सत्तारूढ़ महायुति की ओर से बीजेपी ने अपने 5 उम्मीदवार मैदान में उतारे। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले और मंत्री आशीष शेलार समेत कई बड़े नेता आज नामांकन दाखिल करने पहुंचे। इसके अलावा बीजेपी ने उपचुनाव वाली सीट पर प्रज्ञा सातव को उम्मीदवार बनाया है, जिनके निर्विरोध चुने जाने की संभावना मजबूत मानी जा रही है।
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कांग्रेस और उद्धव गुट में हुआ समझौता
वहीं, शिवसेना (शिंदे गुट) की ओर से नीलम गोरहे और बच्चू कडू ने नामांकन दाखिल किया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) ने जीशान सिद्दीकी को उम्मीदवार बनाया है। सबसे ज्यादा घमासान महाविकास आघाड़ी (MVA) में देखने को मिला। उद्धव ठाकरे की ओर से उम्मीदवार की घोषणा को लेकर कांग्रेस ने सख्त रुख अपनाया। कांग्रेस ने साफ कहा कि अगर उद्धव खुद उम्मीदवार नहीं होंगे, तो सीट कांग्रेस को दी जाए। दोपहर तक चली लंबी बातचीत में मिलिंद नरवेकर, अनिल परब और सुप्रिया सुले जैसे नेता सक्रिय रहे। आखिरकार गठबंधन की एकजुटता बनाए रखने के लिए कांग्रेस ने अंबादास दानवे को समर्थन देने का फैसला किया। नामांकन की समय सीमा खत्म होने से ठीक पहले दानवे ने अपना पर्चा दाखिल किया।
9 सीटों पर उतारे गए कुल 9 उम्मीदवार
आपको बता दें कि कुल 9 सीटों के लिए 9 उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया है। ऐसे में चुनाव का निर्विरोध होना लगभग तय माना जा रहा है, और 12 मई की वोटिंग महज औपचारिकता बन कर रह गई है। उम्मीदवारों की बात करें तो बीजेपी ने सुनील कर्जतकर, माधवी नाइक, विक्रम कोल्हे, प्रमोद जठार और संजय भेंडे को मैदान में उतारा है। वहीं, एनसीपी (अजित पवार गुट) ने जीशान सिद्दीकी और शिवसेना (शिंदे गुट) ने बच्चू कडू और नीलम गोरहे को टिकट दिया है। दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन एमवीए में शिवसेना (उद्धव गुट) से अंबादास दानवे उम्मीदवार हैं। इसके अलावा विधान परिषद उपचुनाव की एक सीट पर बीजेपी ने प्रज्ञा सातव को उम्मीदवार बनाया है।
आखिर कांग्रेस ने क्यों पीछे खींचा कदम?
कांग्रेस द्वारा शिवसेना (यूबीटी) को समर्थन देने के फैसले के पीछे सीधा 'नंबर गेम' था। इस समय उद्धव ठाकरे गुट के 20 विधायक हैं जबकि शरद पवार गुट के 10 विधायक हैं और दोनों का आंकड़ा मिलाकर 30 हो जाता है। MLC चुनाव में एक सीट जीतने के लिए 29 सीट चाहिए, ऐसे में ये दोनों पार्टियां मिलकर एक सीट जीत सकती थीं। अगर कांग्रेस मैदान में उतरती, तो समीकरण बिगड़ सकता था क्योंकि कांग्रेस के 16 और शरद पवार गुट के 10 विधायक मिलाकर आंकड़ा 26 तक ही पहुंच पाता और ऐसे में उद्धव गुट अलग हो जाता। इससे दोनों खेमे कमजोर पड़ते और क्रॉस-वोटिंग का खतरा बढ़ जाता और एक 'पक्की जीत' भी जोखिम में आ सकती थी।
कांग्रेस के पीछे हटने की 3 बड़ी वजहें
कहा जा सकता है कि कांग्रेस के पीछे हटने की 3 बड़ी वजहें रहीं:
- हार का खतरा टालना: कांग्रेस समझ रही थी कि उसके पास सुरक्षित जीत का आंकड़ा नहीं है।
- गठबंधन बचाना: सीधी टक्कर से महाविकास आघाड़ी में दरार पड़ सकती थी, जिसका असर आगे I.N.D.I.A. गठबंधन तक जाता।
- राजनीतिक संदेश देना: आखिरी वक्त तक सख्त रुख अपनाकर कांग्रेस ने यह साफ कर दिया कि उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह आने वाले राज्यसभा और विधानसभा चुनावों में सीट बंटवारे के लिए एक मजबूत संकेत भी है।
कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव में MVA का फोकस जीत से ज्यादा गठबंधन बचाने पर रहा। वहीं, कांग्रेस ने ऐन मौके पर कैंडिडेट न उतारने की चाल चलकर भविष्य के लिए अपने केस को मजबूत कर लिया है।